मराठी म्हणी हा मराठी भाषेचा अनमोल ठेवा आहे. म्हणी म्हणजे जीवनाचा अनुभव शब्दात मांडलेला असतो. MPSC, PSI, STI, ASO, ZP, SSC Board आणि HSC Board परीक्षांमध्ये म्हणींवर आधारित प्रश्न नेहमीच विचारले जातात. या लेखात आम्ही १०० महत्त्वाच्या मराठी म्हणी त्यांच्या अर्थासह दिल्या आहेत.
म्हण म्हणजे काय?
लोकांच्या जीवनानुभवातून निर्माण झालेले, थोडक्यात पण अर्थपूर्ण विचार व्यक्त करणारे वाक्य म्हणजे म्हण होय. म्हण ही स्वतंत्र पूर्ण विचार व्यक्त करते. उदाहरण: “नाचता येईना अंगण वाकडे” — म्हणजे स्वतःची चूक लपवण्यासाठी इतरांना दोष देणे.१०० मराठी म्हणी अर्थासह
| क्र. | म्हण | अर्थ |
|---|---|---|
| १ | अति तेथे माती | कोणत्याही गोष्टीचा अतिरेक वाईट असतो |
| २ | अंथरूण पाहून पाय पसरावे | आपल्या ऐपतीप्रमाणे खर्च करावा |
| ३ | आधी पोटोबा मग विठोबा | आधी पोट भरणे मग देवधर्म |
| ४ | आपण होऊन नाही केले तर देवाने केले असे म्हणावे | स्वतः चांगले काम करावे |
| ५ | उचलली जीभ लावली टाळ्याला | विचार न करता बोलणे |
| ६ | एक ना धड भाराभर चिंध्या | अनेक कामे करता कोणतेही पूर्ण न होणे |
| ७ | काखेत कळसा गावाला वळसा | जवळ असलेली गोष्ट दूर शोधणे |
| ८ | कावळ्याच्या शापाने गाय मरत नाही | दुर्बलाच्या शापाचा काही परिणाम होत नाही |
| ९ | खाई त्याला खवखवे | चुकीचे काम करणाऱ्याला भीती वाटते |
| १० | गरज सरो वैद्य मरो | काम होताच उपकारकर्त्याला विसरणे |
| ११ | घरोघरी मातीच्या चुली | सर्वत्र एकच प्रकारच्या अडचणी असतात |
| १२ | चोराच्या मनात चांदणे | आपल्या मनातील भीतीमुळे संशय वाटणे |
| १३ | जशास तसे | जसे वागाल तसे मिळेल |
| १४ | जिथे जातो तिथे तू माझा सांगाती | देव सर्वत्र असतो |
| १५ | झाडाझडती घेणे | कसून चौकशी करणे |
| १६ | टाकीचे घाव सोसल्याशिवाय देवपण येत नाही | कष्टाशिवाय यश मिळत नाही |
| १७ | ताकापुरता मामा | स्वार्थासाठीच संबंध ठेवणारा |
| १८ | दगडापेक्षा वीट मऊ | दोन वाईट गोष्टींत कमी वाईट निवडणे |
| १९ | नाचता येईना अंगण वाकडे | स्वतःची चूक लपवण्यासाठी इतरांना दोष देणे |
| २० | नावात काय आहे | नावाने नाही तर कर्माने ओळख होते |
| २१ | पळसाला पाने तीनच | प्रत्येक जागी एकच प्रकारचे लोक असतात |
| २२ | पाण्यात राहून माशाशी वैर नको | ज्याच्यावर अवलंबून आहोत त्याच्याशी वाद नको |
| २३ | फाटक्याशी दोस्ती नको | कमी दर्जाच्या माणसाशी मैत्री वाईट |
| २४ | बुडत्याला काडीचा आधार | संकटात छोटीशी मदतही मोठी वाटते |
| २५ | भिकाऱ्याला मागणे नाही | गरजवंताला विनंती करणे व्यर्थ |
| २६ | मेल्याशिवाय स्वर्ग नाही | कष्टाशिवाय फळ मिळत नाही |
| २७ | यथा राजा तथा प्रजा | राज्यकर्त्याप्रमाणे प्रजा असते |
| २८ | रात्र थोडी सोंगे फार | वेळ कमी आणि कामे जास्त |
| २९ | लबाडाच्या घरात सव्वा लबाड | लबाड माणसाला आणखी लबाड माणूस भेटतो |
| ३० | वेळ गेली की सोन्याला तोळा | वेळ निघून गेली की उपाय नाही |
| ३१ | शहाण्याला शब्द एक मुर्खाला लाथ | समजूतदार माणसाला एका शब्दाने कळते |
| ३२ | सुख पाहता जवापाडे दुःख पर्वताएवढे | सुखापेक्षा दुःखच जास्त असते |
| ३३ | हाती असे ते दाती असे | जे मिळते तेच खावे लागते |
| ३४ | कर नाही त्याला डर कशाला | चूक नसेल तर भीती कशाला |
| ३५ | आंधळ्यात काणा राजा | अज्ञानी लोकांत थोड्या ज्ञानी माणसाला महत्त्व |
| ३६ | उंटावरून शेळ्या हाकणे | दुरून सोपे वाटणे |
| ३७ | एका हाताने टाळी वाजत नाही | भांडणासाठी दोघेही कारणीभूत असतात |
| ३८ | ओळखीचा चोर जीवे मारतो | विश्वासघात करणारा जास्त घातक |
| ३९ | कुत्र्याचे शेपूट कधी सरळ होत नाही | दुष्ट माणसाचे वर्तन कधी सुधारत नाही |
| ४० | केल्याने होत आहे रे आधी केलेची पाहिजे | प्रयत्न केल्याशिवाय यश मिळत नाही |
| ४१ | खोट्याचे पाय नसतात | खोटेपणा जास्त काळ टिकत नाही |
| ४२ | गाढवाला गुळाची चव काय | मूर्खाला चांगल्याची किंमत नसते |
| ४३ | चिंता करितो विश्वाची | स्वतःचे सोडून इतरांची काळजी करणे |
| ४४ | जळत्या घरात घरोबा नको | संकटात सापडलेल्याशी संबंध ठेवू नये |
| ४५ | झोपलेल्याला उठवता येते पण जागा असून झोपल्याचे सांगतो त्याला नाही | जाणूनबुजून दुर्लक्ष करणाऱ्याला सांगणे व्यर्थ |
| ४६ | टोपी फिरवणे | फसवणे |
| ४७ | तेल गेले तूप गेले हाती राहिले धुपाटणे | दोन्ही बाजूंनी नुकसान होणे |
| ४८ | दात आहेत तेव्हा चणे नाहीत | जेव्हा गरज होती तेव्हा मिळाले नाही |
| ४९ | नको त्या गावची वाट | निरुपयोगी गोष्टींमागे जाऊ नये |
| ५० | पायाखाली काय आहे ते पाहून चालावे | विचार करूनच पाऊल टाकावे |
| ५१ | बोलण्यापेक्षा करणे श्रेष्ठ | कृती महत्त्वाची आहे बोलणे नाही |
| ५२ | भूक लागली की भाकर गोड लागते | गरज असेल तर कशातही समाधान मिळते |
| ५३ | मन चंगा तो कठौती में गंगा | मन शुद्ध असेल तर सर्वत्र देव आहे |
| ५४ | येरे माझ्या मागल्या | तीच तीच गोष्ट पुन्हा होणे |
| ५५ | राखेखाली निखारा | बाहेरून शांत पण आतून संतापलेला |
| ५६ | लोभापायी जीव गमावणे | लोभामुळे नुकसान होते |
| ५७ | विनाशकाले विपरीत बुद्धी | संकट येते तेव्हा बुद्धी उलटी चालते |
| ५८ | शेरास सव्वाशेर | प्रत्येक बलाढ्याला त्याच्यापेक्षाही बलाढ्य भेटतो |
| ५९ | सगळे मुसळकेर बुडाले पण कढई वाचली | मोठे नुकसान होऊन छोटी गोष्ट वाचणे |
| ६० | हत्तीच्या दात खाण्याचे वेगळे दाखवण्याचे वेगळे | दाखवायचे आणि करायचे वेगळे |
| ६१ | आगीतून फुफाट्यात | एका संकटातून दुसऱ्यात जाणे |
| ६२ | उगाच खोडी काढू नये | कारण नसताना भांडण नको |
| ६३ | एकट्याने वनवास नको | एकट्याने संकटाला तोंड देणे कठीण |
| ६४ | कोंबडे झाकले म्हणून उजाडायचे थांबत नाही | सत्य लपवता येत नाही |
| ६५ | खाण तशी माती | जशी पार्श्वभूमी तसे वर्तन |
| ६६ | गुळाचा गणपती गुळाचाच | दोन्ही एकाच घराण्याचे |
| ६७ | चालत्या गाडीला खीळ घालू नये | चांगले सुरू असताना अडथळा आणू नये |
| ६८ | जे पेराल ते उगवेल | जसे कराल तसे फळ मिळेल |
| ६९ | झाकली मूठ सव्वा लाखाची | गुपित राखणे फायदेशीर असते |
| ७० | टाळक्यावर बर्फ ठेवणे | संयम राखणे |
| ७१ | तोंड दाबून बुक्क्यांचा मार | विरोध न करता त्रास सहन करणे |
| ७२ | दुधाने तोंड पोळले की ताकही फुंकून पितात | एकदा फसल्यावर सावधगिरी येते |
| ७३ | नाकापेक्षा मोती जड | उपकारापेक्षा मदतीची अपेक्षा जास्त |
| ७४ | पाचामुखी परमेश्वर | लोकांचे मत म्हणजे देवाची इच्छा |
| ७५ | बळी तो कान पिळी | जो बलवान तो जिंकतो |
| ७६ | मागे फिरणे म्हणजे शौर्य नाही | संकटापुढे न डगमगणे |
| ७७ | योग्य वेळी योग्य काम | प्रत्येक गोष्टीसाठी योग्य वेळ असते |
| ७८ | रिकाम्या डोक्याचा सैतान | रिकाम्या माणसाला वाईट विचार येतात |
| ७९ | लावणी उगवली लग्न झाले नाही | काम अर्धवट सोडणे |
| ८० | वासरात लंगडी गाय शहाणी | अज्ञानींत कमी ज्ञानी श्रेष्ठ |
| ८१ | शब्द हे शस्त्र आहे | बोलण्याचा परिणाम मोठा असतो |
| ८२ | सत्यमेव जयते | सत्याचाच विजय होतो |
| ८३ | हळद लावली की लग्न नाही | सुरुवात केली म्हणजे संपले नाही |
| ८४ | आयत्या बिळावर नागोबा | दुसऱ्याच्या मेहनतीवर बसणे |
| ८५ | उधळ्याच्या घरात कोंडा | उधळ्या माणसाकडे काही राहत नाही |
| ८६ | एक घाव दोन तुकडे | एकाच प्रयत्नात काम होणे |
| ८७ | करावे तसे भरावे | जशी कृती तसे फळ |
| ८८ | खऱ्याला मरण नाही | सत्य कधी नष्ट होत नाही |
| ८९ | गावचा बैल अन् आंधळ्याचा डोळा | सार्वजनिक मालमत्तेची कोणी काळजी घेत नाही |
| ९० | चार दिवस सासूचे चार दिवस सुनेचे | काळ कधीच एकसारखा राहत नाही |
| ९१ | जन्मास आलो तर करावे काही | आयुष्यात काही तरी कर्तृत्व गाजवावे |
| ९२ | झाकली मूठ कायम ठेवावी | गुपित उघड करू नये |
| ९३ | टोप्या फिरवणे | फसवणूक करणे |
| ९४ | तेरड्याचा रंग तीन दिवस | काही गोष्टी तात्पुरत्याच असतात |
| ९५ | दुसऱ्याच्या डोळ्यातील कुसळ दिसते पण स्वतःच्या डोळ्यातील मुसळ दिसत नाही | इतरांचे दोष दिसतात पण स्वतःचे नाही |
| ९६ | नको त्या माणसाशी संग नको | वाईट माणसाची संगत टाळावी |
| ९७ | पाण्यावर रेघ | क्षणभंगुर गोष्ट |
| ९८ | बोलावे तेवढेच बोलावे | आवश्यक तेवढेच बोलावे |
| ९९ | माणसाची परीक्षा संकटात होते | अडचणीतच खऱ्या माणसाची ओळख होते |
| १०० | हे राम हे राम | आश्चर्य किंवा दुःख व्यक्त करणे |
FAQ
लोकांच्या जीवनानुभवातून निर्माण झालेले, थोडक्यात पण अर्थपूर्ण विचार व्यक्त करणारे वाक्य म्हणजे म्हण होय. म्हण ही स्वतंत्र पूर्ण विचार व्यक्त करते.
MPSC, PSI, STI परीक्षेत ५ ते १० म्हणींवर आधारित प्रश्न विचारले जातात.
म्हण ही स्वतंत्र पूर्ण विचार व्यक्त करते तर वाक्प्रचार अपूर्ण वाक्यात वापरला जातो.
कोणत्याही गोष्टीचा अतिरेक वाईट असतो — हा या म्हणीचा अर्थ आहे.
हेही वाचा:
– मराठी वाक्प्रचार
– समानार्थी शब्द
– विरुद्धार्थी शब्द
– मराठी कोडी





